कांग्रेस को अलविदा कहने वाले 50 नेता: जानिए किन-किन नेताओं ने छोड़ी पार्टी

कांग्रेस पार्टी के भीतर नेतृत्व और कार्यशैली को लेकर असंतोष का मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है। राहुल गांधी के नेतृत्व और पार्टी में फैसले लेने के तरीके को लेकर भी कई नेताओं ने सवाल उठाए हैं। अलग-अलग समय पर कांग्रेस के करीब 50 चर्चित नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। इनमें कई वरिष्ठ नेता, पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री और युवा चेहरे शामिल हैं, जिन्होंने कांग्रेस से अलग होकर दूसरी पार्टियों का दामन थामा या अपनी अलग राजनीतिक राह चुनी। कांग्रेस छोड़ने वाले कुछ नेता ऐसे भी थे, जिन्हें कभी गांधी परिवार का करीबी माना जाता था। पार्टी से अलग होने के बाद कई नेताओं ने नेतृत्व, संगठन की स्थिति, फैसले लेने की प्रक्रिया और अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर असंतोष जाहिर किया। कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से राहुल गांधी और सोनिया गांधी की कार्यशैली की आलोचना की, जबकि कुछ ने राज्य स्तर पर नेतृत्व से मतभेदों को पार्टी छोड़ने की प्रमुख वजह बताया।


आइए, जानते हैं उन 50 चर्चित नेताओं की कहानी, जिन्होंने अलग-अलग समय पर कांग्रेस से नाता तोड़ा और अपनी राजनीति के लिए नई राह चुनी।

50. कुणाल पाटिल: तीन पीढ़ियों का कांग्रेस से रिश्ता खत्म
महाराष्ट्र के नेता कुणाल पाटिल भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं। मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने उनका स्वागत किया। कुणाल पाटिल ने पार्टी बदलने के फैसले के पीछे अपने क्षेत्र के विकास को वजह बताया। उनका कहना है कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से कांग्रेस से जुड़ा रहा, लेकिन अब पार्टी की नीतियां जनहित के अनुरूप नहीं रह गई हैं। उन्होंने कहा कि अपने क्षेत्र के विकास के लिए उन्हें भाजपा में शामिल होने का फैसला लेना पड़ा। कुणाल पाटिल के परिवार का धुले क्षेत्र की राजनीति में पुराना प्रभाव रहा है। उनके दादा चुडामण अण्णा ने 1962 में जवाहरलाल नेहरू की लोकप्रियता के बावजूद चुनाव में जीत दर्ज की थी। वह करीब 25 वर्षों तक सांसद रहे। उनके पिता भी सात बार कांग्रेस विधायक रहे और 2009 तक धुले का प्रतिनिधित्व करते रहे।

कुणाल पाटिल ने कहा कि उनके परिवार ने हमेशा जनता की सेवा की है और अब वह इस जिम्मेदारी को आगे बढ़ाना चाहते हैं। कुणाल पाटिल ने 2014 में पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी। 2019 में भी उन्हें जनता का समर्थन मिला। ऐसे में उनका भाजपा में जाना महाराष्ट्र में कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक झटका माना जा रहा है, खासकर तब जब राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारी चल रही है।

49. विजेंदर सिंह: ओलंपिक पदक विजेता मुक्केबाज भाजपा में शामिल
लोकसभा चुनाव 2024 से कुछ सप्ताह पहले ओलंपिक पदक विजेता मुक्केबाज विजेंदर सिंह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। वह 2019 में कांग्रेस से जुड़े थे और दक्षिण दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव लड़े थे। हालांकि, उन्हें भाजपा के रमेश बिधूड़ी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। विजेंदर सिंह के कांग्रेस छोड़ने की खबर उस समय चर्चा में आई, जब उनके मथुरा-वृंदावन लोकसभा क्षेत्र से भाजपा सांसद हेमा मालिनी के खिलाफ चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर भी चर्चा हो रही थी। लेकिन इन अटकलों के बीच वह भाजपा में शामिल हो गए। विजेंदर सिंह की खेल जगत में खास पहचान रही है। उन्होंने 2008 के बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर भारतीय मुक्केबाजी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी। वह ओलंपिक में पदक जीतने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज बने थे। उनके भाजपा में जाने को हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय के बीच पार्टी की पहुंच मजबूत करने के लिहाज से भी अहम माना गया।

48. गौरव वल्लभ: कांग्रेस की दिशा पर सवाल उठाकर दिया इस्तीफा
कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे गौरव वल्लभ ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। वह राजस्थान की उदयपुर विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ चुके थे। गौरव वल्लभ ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर पार्टी की दिशा और कार्यशैली पर असंतोष जताया। अपने पत्र में उन्होंने कहा कि पार्टी जिस तरह आगे बढ़ रही है, उसमें वह खुद को सहज महसूस नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने लिखा, 'कांग्रेस पार्टी आज जिस प्रकार से दिशाहीन होकर आगे बढ़ रही है, उसमें मैं ख़ुद को सहज महसूस नहीं कर पा रहा। मैं ना तो सनातन विरोधी नारे लगा सकता हूं और ना ही सुबह-शाम देश के वेल्थ क्रिएटर्स को गाली दे सकता। इसलिए मैं कांग्रेस पार्टी के सभी पदों व प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे रहा हूं।' उन्होंने अपने त्यागपत्र में यह भी लिखा कि वह भावुक हैं और उनका मन व्यथित है। गौरव वल्लभ ने कहा कि वह कई बातें कहना और लिखना चाहते हैं, लेकिन सच को छिपाना भी अपराध है और वह इसका भागीदार नहीं बनना चाहते।

इसी दौर में गुजरात कांग्रेस के नेता रोहन गुप्ता ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। लोकसभा चुनाव से अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के बाद उन्होंने खरगे को पत्र लिखकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए। रोहन गुप्ता ने संचार विभाग से जुड़े एक नेता पर लगातार अपमान और चरित्र हनन करने का आरोप लगाया था।

47. सावित्री जिंदल: कांग्रेस से अलग हुईं हरियाणा की पूर्व मंत्री
हरियाणा की पूर्व मंत्री सावित्री जिंदल ने भी कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया। उन्हें गांधी परिवार के करीबियों में गिना जाता रहा है। उनके पार्टी छोड़ने को लोकसभा चुनाव 2024 से पहले कांग्रेस के लिए एक और झटके के तौर पर देखा गया। सावित्री जिंदल का कांग्रेस से अलग होना इसलिए भी चर्चा में रहा, क्योंकि इससे कुछ दिन पहले ही उनके बेटे नवीन जिंदल ने भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। नवीन जिंदल कुरुक्षेत्र से दो बार सांसद रह चुके हैं और भाजपा में शामिल होने के बाद पार्टी ने उन्हें इसी लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया था। सावित्री जिंदल हरियाणा की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रही हैं। उनके कांग्रेस छोड़ने से राज्य में पार्टी के पुराने नेताओं और प्रभावशाली परिवारों के साथ उसके रिश्तों को लेकर भी सवाल उठे।

46. अशोक चव्हाण: महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने छोड़ी कांग्रेस
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने 12 फरवरी 2024 को कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। उनके इस फैसले से राज्य की राजनीति में हलचल मच गई। उस समय वह भोकर विधानसभा सीट से विधायक थे और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य भी रह चुके थे। अशोक चव्हाण का राजनीतिक परिवार महाराष्ट्र में काफी प्रभावशाली रहा है। उनके पिता शंकरराव चव्हाण भी राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके थे। पिता और पुत्र, दोनों के मुख्यमंत्री बनने के कारण चव्हाण परिवार की महाराष्ट्र कांग्रेस में विशेष पहचान रही। अशोक चव्हाण नांदेड़ लोकसभा सीट से 2014 में सांसद चुने गए थे। वह महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष और महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी में महासचिव जैसे पदों पर भी रह चुके थे। कांग्रेस छोड़ने के बाद अशोक चव्हाण भाजपा में शामिल हो गए। उनके पार्टी छोड़ने को महाराष्ट्र में कांग्रेस के संगठन और चुनावी रणनीति के लिहाज से बड़ा नुकसान माना गया।

45. किरण कुमार रेड्डी: अविभाजित आंध्र प्रदेश के आखिरी मुख्यमंत्री
अविभाजित आंध्र प्रदेश के आखिरी मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर पार्टी से इस्तीफा दिया। किरण कुमार रेड्डी ने कांग्रेस के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा था कि पार्टी लोगों तक पहुंचने में नाकाम हो रही है। उनके मुताबिक, पार्टी आलाकमान के गलत फैसलों के कारण कांग्रेस एक के बाद एक राज्यों में कमजोर हो रही है। उन्होंने यह भी कहा था कि यह समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि कई राज्यों में कांग्रेस की स्थिति ऐसी ही है। उनके आरोपों के मुताबिक, पार्टी नेतृत्व अपनी बात को ही सही मानता है और दूसरे लोगों की राय को महत्व नहीं देता। किरण कुमार रेड्डी ने अपने बयान में एक कहानी का जिक्र करते हुए पार्टी नेतृत्व की निर्णय प्रक्रिया पर तंज कसा था। उनका कहना था कि नेतृत्व न तो खुद सही ढंग से सोचता है और न ही किसी दूसरे की सलाह मानता है। इसी तरह के मतभेदों के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया।

44. गुलाम नबी आजाद: गांधी परिवार के पुराने सहयोगी ने बनाई अपनी पार्टी
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और गांधी परिवार के करीबी रहे गुलाम नबी आजाद ने अगस्त 2022 में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। उनके फैसले को कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना गया, क्योंकि वह लंबे समय तक पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे थे। सोनिया गांधी को भेजे गए अपने इस्तीफे में गुलाम नबी आजाद ने पार्टी की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस में लिए जाने वाले फैसले जनहित और देशहित के बजाय कुछ लोगों के निजी हितों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके आजाद ने राहुल गांधी की कार्यशैली की भी आलोचना की थी। उन्होंने राहुल गांधी को अपरिपक्व बताते हुए उनके व्यवहार पर सवाल उठाए। आजाद ने यह आरोप भी लगाया था कि पार्टी के फैसलों में सोनिया गांधी की भूमिका सीमित हो गई है और राहुल गांधी के करीबी लोग निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। कांग्रेस छोड़ने के बाद गुलाम नबी आजाद ने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाई। उनके जाने से जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस को एक अनुभवी और प्रभावशाली नेता का साथ खोना पड़ा।

43. कैप्टन अमरिंदर सिंह: पंजाब में नेतृत्व से टकराव के बाद अलग हुए
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोड़ते समय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने सोनिया गांधी को सात पन्नों का पत्र लिखकर अपने साथ हुए व्यवहार पर नाराजगी जताई थी। अमरिंदर सिंह ने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी ने उनके अपमान को रोकने के लिए कदम नहीं उठाए। उन्होंने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को भी हालात के लिए जिम्मेदार ठहराया था। अपने पत्र में उन्होंने कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में कांग्रेस का कोई दूसरा नेता उस तरह के अपमान का सामना नहीं करेगा, जैसा उन्हें करना पड़ा। उन्होंने नवजोत सिंह सिद्धू पर भी उन्हें अपमानित करने का आरोप लगाया था और कहा था कि राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और हरीश रावत ने सिद्धू को समर्थन दिया। पंजाब की राजनीति में अमरिंदर सिंह लंबे समय तक कांग्रेस का प्रमुख चेहरा रहे थे। उनके पार्टी छोड़ने से राज्य में कांग्रेस के भीतर चल रहे नेतृत्व संघर्ष और आपसी मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आए।

42. एसएम कृष्णा: वंशवादी नेतृत्व को लेकर उठाए सवाल
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा ने भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। पार्टी से अलग होने के बाद उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व और कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति पर सवाल उठाए। कृष्णा का कहना था कि राहुल गांधी की पार्ट टाइम राजनीति से कांग्रेस को दोबारा राजनीतिक मजबूती नहीं मिल सकती। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कांग्रेस को अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करनी है, तो उसे गांधी परिवार के वंशवादी नेतृत्व पर निर्भरता छोड़नी होगी। एसएम कृष्णा कर्नाटक की राजनीति के अनुभवी नेताओं में गिने जाते रहे हैं। ऐसे नेता का कांग्रेस से अलग होना पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम था।

41. नारायण दत्त तिवारी: उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री
नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड, दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री रह चुके थे। उन्होंने 2017 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने का फैसला किया था। कांग्रेस छोड़ते समय तिवारी ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर जमीनी वास्तविकताओं से दूर रहने का आरोप लगाया था। उनका मानना था कि पार्टी आलाकमान को राज्यों में मौजूद राजनीतिक परिस्थितियों और संगठन की वास्तविक स्थिति का पर्याप्त अंदाजा नहीं है। तिवारी का कांग्रेस से लंबा राजनीतिक रिश्ता रहा था। ऐसे अनुभवी नेता का पार्टी छोड़ना कांग्रेस के पुराने नेताओं के बीच असंतोष की चर्चा को और मजबूत करने वाला घटनाक्रम बना।

40. गिरिधर गमांग: पार्टी के फैसलों से असंतुष्ट होकर छोड़ा साथ
ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग ने 2015 में कांग्रेस छोड़ दी थी। उन्होंने पार्टी के नेतृत्व पर समय पर और निर्णायक फैसले नहीं लेने का आरोप लगाया था। गमांग का नाम 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के विश्वास मत के दौरान भी चर्चा में आया था। उस समय लोकसभा में उनके एक वोट के कारण वाजपेयी सरकार बहुमत साबित नहीं कर पाई थी और गिर गई थी। गमांग लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे, लेकिन बाद में पार्टी के नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया से असंतोष के कारण उन्होंने अलग रास्ता चुन लिया।

39. नारायण राणे: मुख्यमंत्री बनाने का वादा पूरा नहीं होने का आरोप
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने कांग्रेस छोड़ते समय पार्टी नेतृत्व पर वादा पूरा नहीं करने का आरोप लगाया था। कांग्रेस से अलग होने के साथ उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया था। राणे ने कहा था कि जब उन्होंने शिवसेना छोड़कर कांग्रेस का साथ दिया, तब सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का आश्वासन दिया था। उनके मुताबिक, उनसे दो बार यह बात कही गई, लेकिन बाद में वादा पूरा नहीं किया गया। राणे ने यह भी आरोप लगाया था कि कांग्रेस के शीर्ष नेता पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए गंभीर नहीं हैं। कांग्रेस से पहले वह शिवसेना में थे और 1999 में करीब छह महीने तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी रहे थे। बाद में वह भाजपा में शामिल हुए और केंद्र सरकार में मंत्री बने।

38. लुईजिन्हो फ्लेरियो: कांग्रेस के भविष्य पर जताया था संदेह
गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुईजिन्हो फ्लेरियो ने कांग्रेस छोड़ते समय पार्टी के भविष्य पर सवाल उठाए थे। सोनिया गांधी को लिखे अपने त्यागपत्र में उन्होंने कहा था कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए उन्हें कांग्रेस का भविष्य दिखाई नहीं देता। फ्लेरियो के मुताबिक, उन्होंने पार्टी को एकजुट रखने की कोशिश की, लेकिन शीर्ष नेतृत्व की अनदेखी के कारण उनके प्रयास सफल नहीं हो पाए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि कांग्रेस अपने संस्थापकों के आदर्शों और सिद्धांतों के विपरीत काम कर रही है। गोवा में कांग्रेस के पुराने नेताओं में शामिल फ्लेरियो का पार्टी छोड़ना राज्य की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम था।

37. विजय बहुगुणा: उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री ने भाजपा का दामन थामा
विजय बहुगुणा 2012 से 2014 तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे थे। उनका परिवार लंबे समय से कांग्रेस से जुड़ा रहा था। उनके पिता हेमवती नंदन बहुगुणा कांग्रेस के बड़े नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे। उनकी बहन भी उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रही थीं। 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ के बाद राहत कार्यों को लेकर उनकी सरकार और नेतृत्व पर सवाल उठे थे। इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। करीब दो साल बाद विजय बहुगुणा और उनकी बहन रीता बहुगुणा जोशी ने कांग्रेस छोड़ दी। विजय बहुगुणा 2016 में भाजपा में शामिल हो गए। उनके पार्टी छोड़ने को उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना गया।

36. शंकर सिंह वाघेला: गुजरात कांग्रेस के नेतृत्व से मतभेद
गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला ने 2017 में कांग्रेस छोड़ दी थी। वह राज्य की राजनीति के प्रमुख नेताओं में गिने जाते रहे हैं। वाघेला ने पार्टी से अलग होने के समय राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि कांग्रेस नेतृत्व पार्टी के हित में समय पर सही फैसले नहीं ले रहा है। गुजरात में कांग्रेस के लिए वाघेला का राजनीतिक अनुभव और प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता था। ऐसे में उनके पार्टी छोड़ने से राज्य में कांग्रेस की राजनीतिक चुनौतियां बढ़ गईं।

35. अजित जोगी: कांग्रेस छोड़कर बनाई अलग पार्टी
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी ने 2016 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाई। अजित जोगी ने कांग्रेस छोड़ते समय आरोप लगाया था कि पार्टी गांधी-नेहरू की विचारधारा से भटक गई है। उनके इस बयान से स्पष्ट था कि वह पार्टी की दिशा और नेतृत्व से संतुष्ट नहीं थे। छत्तीसगढ़ की राजनीति में जोगी का अलग प्रभाव रहा था। कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश की।

34. जगदंबिका पाल: लोकसभा चुनाव से पहले छोड़ी कांग्रेस
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री जगदंबिका पाल ने 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़ दी थी और भाजपा में शामिल हो गए थे। वह उत्तर प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते थे। जगदंबिका पाल ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस के बड़े नेता उन्हें अपमानित कर रहे थे। उनके पार्टी छोड़ने से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को एक अनुभवी नेता का साथ खोना पड़ा।

33. रवनीत सिंह बिट्टू: पंजाब में कांग्रेस को लगा झटका
पंजाब के लुधियाना से सांसद रहे रवनीत सिंह बिट्टू ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया था। उन्हें राहुल गांधी के करीबी नेताओं में गिना जाता रहा है। रवनीत सिंह बिट्टू पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं। वह राज्य कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे और लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीत चुके थे। 2009 में आनंदपुर साहिब से सांसद बनने के बाद उन्होंने 2014 और 2019 में लुधियाना सीट से जीत दर्ज की थी। उनके भाजपा में शामिल होने को पंजाब में कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान माना गया। राज्य में उनके राजनीतिक प्रभाव और चुनावी अनुभव के कारण उनका पार्टी छोड़ना काफी चर्चा में रहा।

32. नवीन जिंदल: कुरुक्षेत्र से दो बार सांसद रहे नेता ने छोड़ी कांग्रेस
नवीन जिंदल ने भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। भाजपा में शामिल होने के कुछ ही समय बाद उन्हें हरियाणा की कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट से उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। नवीन जिंदल कुरुक्षेत्र से दो बार सांसद रह चुके हैं। उनका भाजपा में जाना कांग्रेस के लिए राजनीतिक नुकसान माना गया, जबकि भाजपा को हरियाणा में एक जाना-पहचाना चेहरा मिला। भाजपा में शामिल होने के बाद नवीन जिंदल ने कहा था कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने में योगदान देना चाहते हैं। उन्होंने कहा था कि वह लोगों का जीवन बेहतर बनाने और भारत को विकसित देश बनाने की दिशा में काम करना चाहते हैं।

31. बाबा सिद्दीकी: चार दशक से अधिक पुराना रिश्ता तोड़ा
महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार के दौरान मंत्री रहे बाबा सिद्दीकी ने फरवरी 2024 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। इसके दो दिन बाद वह अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। बाबा सिद्दीकी करीब चार दशक से अधिक समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे थे। वह मुंबई में पार्टी का एक प्रमुख अल्पसंख्यक चेहरा माने जाते थे और बांद्रा पश्चिम विधानसभा सीट से तीन बार विधायक चुने गए थे। उनका कांग्रेस छोड़ना महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चा का विषय बना। लंबे समय तक पार्टी से जुड़े रहने के बाद उनके अलग होने को राज्य में कांग्रेस के संगठनात्मक आधार के लिए एक झटका माना गया।

30. मिलिंद देवरा: भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दिन छोड़ी पार्टी
मिलिंद देवरा ने 14 जनवरी 2024 को कांग्रेस छोड़कर शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट का दामन थाम लिया था। उनका यह फैसला राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू होने के दिन सामने आया, इसलिए इसे कांग्रेस के लिए राजनीतिक झटके के तौर पर देखा गया। मिलिंद देवरा महाराष्ट्र कांग्रेस के बड़े नेताओं में गिने जाते थे। वह दो बार लोकसभा सांसद रह चुके थे और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे थे। कांग्रेस छोड़ते समय देवरा ने कहा था कि उनके परिवार का पार्टी से 55 साल पुराना रिश्ता समाप्त हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि वह ऐसे नेता के साथ काम करना चाहते हैं, जो रचनात्मक विचारों को महत्व देता हो और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहता हो।

29. सीआर केसवन: कांग्रेस के पुराने राजनीतिक परिवार से आने वाले नेता
सीआर केसवन ने कांग्रेस से नाता तोड़ने का फैसला किया था। उनका परिवार लंबे समय से कांग्रेस से जुड़ा रहा था। उनके इस फैसले को पार्टी छोड़ने वाले उन नेताओं की सूची में देखा गया, जिन्होंने संगठन की दिशा को लेकर असंतोष जताया। कांग्रेस से अलग होने के बाद केसवन भाजपा में शामिल हो गए। उनका पार्टी छोड़ना ऐसे समय में हुआ, जब कांग्रेस से जुड़े कई पुराने राजनीतिक परिवारों के सदस्य अलग-अलग कारणों से पार्टी से दूरी बना रहे थे।

28. अनिल एंटनी: कांग्रेस नेतृत्व से असहमति के बाद भाजपा में शामिल
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एके एंटनी के बेटे अनिल एंटनी ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। अनिल एंटनी का पार्टी छोड़ने का फैसला उस समय चर्चा में आया, जब बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक विवाद चल रहा था। उन्होंने इस मुद्दे पर कांग्रेस के रुख से असहमति जताई थी। उनका भाजपा में शामिल होना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि उनके पिता एके एंटनी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शामिल रहे हैं और केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर काम कर चुके हैं।

27. कपिल सिब्बल: कांग्रेस से अलग होकर राज्यसभा पहुंचे
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने 2022 में पार्टी छोड़ दी थी। वह लंबे समय तक कांग्रेस के प्रमुख कानूनी और राजनीतिक चेहरों में शामिल रहे थे। कपिल सिब्बल ने कांग्रेस नेतृत्व और संगठन में सुधार की जरूरत पर कई बार सवाल उठाए थे। वह उन नेताओं में थे, जिन्होंने पार्टी के भीतर सामूहिक नेतृत्व और आंतरिक लोकतंत्र की मांग की थी। कांग्रेस छोड़ने के बाद सिब्बल निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंचे। उन्हें विपक्षी दलों का समर्थन मिला। उनका पार्टी से अलग होना कांग्रेस के लिए एक अनुभवी नेता को खोने के रूप में देखा गया।

26. सुनील जाखड़: पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने छोड़ी पार्टी
पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने 2022 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। वह राज्य में पार्टी के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे और उनके परिवार का भी कांग्रेस से पुराना संबंध रहा था। जाखड़ ने कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली और पार्टी में अपनी स्थिति को लेकर असंतोष जताया था। उनका कहना था कि पार्टी में फैसले लेने के तरीके और नेतृत्व की प्राथमिकताओं को लेकर समस्याएं हैं। कांग्रेस छोड़ने के बाद सुनील जाखड़ भाजपा में शामिल हो गए। पंजाब की राजनीति में उनका जाना कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम था।

25. आरपीएन सिंह: पूर्व केंद्रीय मंत्री ने भाजपा का दामन थामा
पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आरपीएन सिंह ने 2022 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने का फैसला किया था। वह उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे थे और केंद्र सरकार में मंत्री भी रह चुके थे। आरपीएन सिंह का कांग्रेस छोड़ना उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले हुआ था। उनके भाजपा में शामिल होने को राज्य में कांग्रेस की चुनावी तैयारियों के लिहाज से एक झटका माना गया। वह लंबे समय तक कांग्रेस के संगठन और चुनावी राजनीति से जुड़े रहे थे। उनके अलग होने से पार्टी के पुराने नेताओं के बीच असंतोष की चर्चा को और बल मिला।

24. ज्योतिरादित्य सिंधिया: मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार के लिए बड़ा झटका
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मार्च 2020 में कांग्रेस छोड़ दी थी और भाजपा में शामिल हो गए थे। उनके साथ मध्य प्रदेश के कई कांग्रेस विधायकों ने भी पार्टी से दूरी बना ली थी। सिंधिया कांग्रेस के युवा और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। उनके परिवार का कांग्रेस से पुराना रिश्ता रहा था। वह राहुल गांधी के करीबी नेताओं में भी शामिल माने जाते थे। उनके पार्टी छोड़ने और विधायकों के इस्तीफे के बाद मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार बहुमत खो बैठी थी। इसके बाद राज्य में भाजपा की सरकार बनी। इस घटनाक्रम को कांग्रेस के लिए हाल के वर्षों के सबसे बड़े राजनीतिक झटकों में गिना जाता है।

23. जितिन प्रसाद: उत्तर प्रदेश के युवा नेता ने छोड़ी कांग्रेस
कांग्रेस के युवा नेताओं में शामिल जितिन प्रसाद ने 2021 में पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। वह पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे थे और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में गिने जाते थे। जितिन प्रसाद उन नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने कांग्रेस के संगठन और नेतृत्व में सुधार की जरूरत पर सवाल उठाए थे। उनके भाजपा में शामिल होने से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को एक जाना-पहचाना युवा चेहरा खोना पड़ा। उनके परिवार का भी कांग्रेस से पुराना संबंध रहा था। ऐसे में उनका पार्टी छोड़ना कांग्रेस के पुराने राजनीतिक परिवारों से जुड़े नेताओं के अलग होने की कड़ी में देखा गया।

22. सतपाल महाराज: उत्तराखंड में कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल
उत्तराखंड के नेता सतपाल महाराज ने 2014 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने का फैसला किया था। वह राज्य की राजनीति में प्रभावशाली माने जाते रहे हैं। सतपाल महाराज का पार्टी छोड़ना लोकसभा चुनाव के आसपास हुआ था। उनके भाजपा में शामिल होने से उत्तराखंड में कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान हुआ और भाजपा को एक अनुभवी नेता का साथ मिला।

21. खुशबू सुंदर: संगठन में अनदेखी का आरोप
अभिनेत्री और नेता खुशबू सुंदर ने 2020 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। वह कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर की प्रवक्ता रही थीं और दक्षिण भारत की राजनीति में सक्रिय थीं। सोनिया गांधी को लिखे अपने पत्र में खुशबू सुंदर ने आरोप लगाया था कि पार्टी के शीर्ष स्तर पर बैठे कुछ लोग जमीनी वास्तविकताओं से जुड़े नहीं हैं और तानाशाही रवैया अपनाते हैं। उन्होंने कहा था कि उनकी तरह काम करने की इच्छा रखने वाले लोगों को दबाया जाता है। खुशबू सुंदर ने यह भी लिखा था कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बावजूद उन्होंने पार्टी ज्वाइन की थी, लेकिन वहां काम करने वाले लोगों की अनदेखी की जाती है। बाद में वह भाजपा में शामिल हो गईं।

20. हिमंत बिस्वा सरमा: असम में कांग्रेस को चुनौती देने वाले नेता
असम के नेता हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने का फैसला किया था। वह राज्य में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और तरुण गोगोई सरकार के दौरान सक्रिय भूमिका निभा चुके थे। हिमंत बिस्वा सरमा के तरुण गोगोई के साथ मतभेद रहे थे। उनका आरोप था कि इन मतभेदों के कारण उन्हें पार्टी में हाशिये पर डाल दिया गया। उन्होंने राहुल गांधी से मिलने का समय मांगे जाने के दौरान हुई एक घटना का भी जिक्र किया था, जिसे कांग्रेस नेतृत्व के प्रति उनकी नाराजगी के संदर्भ में बताया जाता रहा है। 2016 में भाजपा में शामिल होने के बाद हिमंत बिस्वा सरमा ने असम में कांग्रेस के खिलाफ भाजपा की राजनीतिक रणनीति में अहम भूमिका निभाई। वह आगे चलकर असम के मुख्यमंत्री बने। उनके कांग्रेस छोड़ने को राज्य में पार्टी के लिए बड़ा नुकसान माना गया।

19. अशोक चौधरी: बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने उठाए सवाल
बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और विधान परिषद सदस्य अशोक चौधरी ने 2018 में तीन अन्य विधान परिषद सदस्यों के साथ कांग्रेस छोड़ दी थी। उनके इस फैसले को बिहार में कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना गया। अशोक चौधरी ने पार्टी छोड़ते समय राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि कांग्रेस का बिहार नेतृत्व राष्ट्रीय जनता दल के साथ संबंधों को लेकर स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पा रहा है। उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी के प्रभारी नेता आलाकमान को सही जानकारी नहीं देते, जिसके कारण गलत फैसले होते हैं। उनके बयान से बिहार कांग्रेस में नेतृत्व और गठबंधन की राजनीति को लेकर असंतोष सामने आया था।

18. संजय झा: आंतरिक लोकतंत्र की कमी का आरोप
कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे संजय झा ने पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे। उन्होंने लेखों और साक्षात्कारों के माध्यम से कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की कमी और संगठन की कमजोरियों की चर्चा की। संजय झा ने कहा था कि पार्टी में सदस्यों की बात नहीं सुनी जाती और उसके पास मजबूत आंतरिक व्यवस्था का अभाव है। उनका यह भी कहना था कि सरकार की आलोचना करने के साथ-साथ कांग्रेस को शासन का एक वैकल्पिक मॉडल भी जनता के सामने रखना चाहिए। पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाने के बाद उन्हें कांग्रेस के प्रवक्ता पद से हटा दिया गया था। उनका मामला कांग्रेस के भीतर असहमति और संगठनात्मक सुधार की मांग को लेकर चर्चा में रहा।

17. प्रियंका चतुर्वेदी: पार्टी में दोबारा शामिल किए गए नेताओं से नाराजगी
कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने 2019 में पार्टी छोड़ दी थी और शिवसेना में शामिल हो गई थीं। उनकी नाराजगी का कारण मथुरा में पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा कथित अभद्र व्यवहार का मामला था। बताया गया था कि जिन नेताओं पर अभद्रता के आरोप लगे थे, उन्हें पहले पार्टी से बाहर किया गया और बाद में दोबारा शामिल कर लिया गया। प्रियंका चतुर्वेदी इस फैसले से नाराज थीं। उन्होंने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया और बाद में शिवसेना से जुड़ गईं। उनका मामला कांग्रेस में अनुशासन और महिला नेताओं के साथ व्यवहार को लेकर चर्चा में रहा।

16. वाईएस जगन मोहन रेड्डी: अलग पार्टी बनाकर बनाई राजनीतिक जमीन
वाईएस जगन मोहन रेड्डी के पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे। 2009 में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में पिता की मृत्यु के बाद जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठी थी, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने यह मांग स्वीकार नहीं की। इसके बाद जगन मोहन रेड्डी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ते गए। उन्होंने 2010 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाने का फैसला किया। आगे चलकर उनकी पार्टी ने आंध्र प्रदेश की राजनीति में मजबूत जगह बनाई। जगन मोहन रेड्डी का कांग्रेस से अलग होना राज्य में पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक नुकसान साबित हुआ।

15. सुष्मिता देव: कांग्रेस की महिला इकाई की अध्यक्ष ने छोड़ी पार्टी
सुष्मिता देव कांग्रेस की महिला इकाई की राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुकी थीं। उन्होंने 2021 में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और अगस्त 2021 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गईं। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष मोहन देव की बेटी हैं। उनका परिवार लंबे समय से कांग्रेस से जुड़ा रहा था। सुष्मिता देव के कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद असम विधानसभा चुनाव के समय से चर्चा में थे। पार्टी छोड़ने के बाद वह तृणमूल कांग्रेस से जुड़ीं और राज्यसभा सांसद बनीं।

14. अशोक तंवर: हरियाणा में कांग्रेस का युवा चेहरा अलग हुआ
हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर ने 2019 में कांग्रेस छोड़ दी थी। वह राहुल गांधी के करीबी नेताओं में गिने जाते थे और राज्य में पार्टी के युवा चेहरों में शामिल थे। अशोक तंवर ने पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक मामलों को लेकर असंतोष जताया था। कांग्रेस से अलग होने के बाद वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। उनके पार्टी छोड़ने से हरियाणा में कांग्रेस को एक ऐसा नेता खोना पड़ा, जो संगठन और युवाओं के बीच पहचान रखता था।

13. अदिति सिंह: रायबरेली से कांग्रेस विधायक ने तोड़ा नाता
रायबरेली से विधायक रहीं अदिति सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी थी। रायबरेली लंबे समय तक सोनिया गांधी का संसदीय क्षेत्र रहा था और अदिति सिंह को कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के करीबी परिवार से जुड़ा माना जाता था। अदिति सिंह ने पार्टी की नीतियों और कार्यशैली को लेकर असंतोष जताया था। बाद में वह भाजपा में शामिल हो गईं। उनका कांग्रेस छोड़ना इसलिए भी चर्चा में रहा, क्योंकि रायबरेली कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र रहा है।

12. विक्रमादित्य सिंह: जम्मू-कश्मीर के मुद्दों पर मतभेद
जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनके विचार पार्टी के रुख से मेल नहीं खाते। विक्रमादित्य सिंह ने कांग्रेस पर जमीनी वास्तविकताओं से दूर रहने का आरोप भी लगाया था। उनका कहना था कि राज्य के महत्वपूर्ण मुद्दों पर पार्टी की सोच और स्थानीय परिस्थितियों के बीच अंतर है। उनके पार्टी छोड़ने को जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस के लिए एक और झटका माना गया।

11. हार्दिक पटेल: गुजरात कांग्रेस के नेतृत्व से नाराजगी
गुजरात के युवा नेता हार्दिक पटेल ने 2022 में कांग्रेस छोड़ दी थी। वह पाटीदार आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे और बाद में कांग्रेस से जुड़े थे। हार्दिक पटेल ने अपने इस्तीफे में राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि जब वह राहुल गांधी से मिले, तो शीर्ष नेता मोबाइल फोन पर व्यस्त थे। उन्होंने गुजरात कांग्रेस की कार्यशैली की आलोचना करते हुए आरोप लगाया था कि पार्टी राज्य के वास्तविक मुद्दों के बजाय दूसरी चीजों में ज्यादा दिलचस्पी लेती है। उनके बयान में नेताओं के लिए “चिकन सैंडविच” की व्यवस्था का भी जिक्र था। हार्दिक पटेल के कांग्रेस छोड़ने के बाद वह भाजपा में शामिल हो गए। गुजरात की राजनीति में उनके इस फैसले को महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना गया।

10. अल्पेश ठाकोर: कांग्रेस पर मनमाने फैसलों का आरोप
गुजरात के युवा नेता अल्पेश ठाकोर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। वह राज्य में पिछड़े वर्गों और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े मुद्दों के कारण चर्चा में आए थे। कांग्रेस छोड़ते समय अल्पेश ठाकोर ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि पार्टी में फैसले मनमाने ढंग से लिए जाते हैं और नेतृत्व को जमीनी हकीकत की पर्याप्त जानकारी नहीं है। उनके भाजपा में जाने से गुजरात में कांग्रेस को एक ऐसा नेता खोना पड़ा, जो सामाजिक समीकरणों और स्थानीय राजनीति में पहचान रखता था।

9. अश्वनी कुमार: चार दशक बाद कांग्रेस से अलग हुए पूर्व कानून मंत्री
पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री अश्वनी कुमार ने फरवरी 2022 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। वह करीब चार दशक तक पार्टी से जुड़े रहे थे। सोनिया गांधी को लिखे अपने त्यागपत्र में उन्होंने कहा था कि उनका यह कदम उनकी गरिमा के अनुरूप है। उन्होंने बाद में एक टीवी साक्षात्कार में कांग्रेस के भविष्य को लेकर भी चिंता जताई थी। अश्वनी कुमार के पार्टी छोड़ने को कांग्रेस के उन पुराने नेताओं के अलग होने की कड़ी में देखा गया, जो संगठन की दिशा और नेतृत्व की कार्यशैली से असंतुष्ट थे।

8. जयंती नटराजन: पूर्व केंद्रीय मंत्री ने 2015 में छोड़ी पार्टी

पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंती नटराजन ने 30 जनवरी 2015 को कांग्रेस छोड़ दी थी। उनका परिवार 1960 के दशक से कांग्रेस से जुड़ा रहा था। उनके नाना एम. भक्तवत्सलम तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रह चुके थे। जयंती नटराजन ने पार्टी छोड़ते समय राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं पर आरोप लगाया था कि उन्हें कुछ मामलों में बलि का बकरा बनाया गया। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों का भी उस समय उल्लेख हुआ था, हालांकि पार्टी छोड़ते वक्त उन्होंने अपने साथ हुए व्यवहार पर नाराजगी जताई थी। उनके इस्तीफे ने कांग्रेस के भीतर वरिष्ठ नेताओं और नेतृत्व के बीच मतभेदों को लेकर चर्चा तेज कर दी थी।

7. जीके वासन: तमिलनाडु इकाई को महत्व नहीं देने का आरोप
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में मंत्री रह चुके जीके वासन ने नवंबर 2014 में कांग्रेस छोड़ दी थी। उनके पिता जीके मूपनार भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे थे। वासन ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस में तमिलनाडु इकाई को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। उनका कहना था कि राज्य के नेताओं और संगठन की जरूरतों को पार्टी नेतृत्व गंभीरता से नहीं लेता। कांग्रेस छोड़ने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने अपनी पार्टी, देसिया तमिल मनीला कांग्रेस, की स्थापना की। इस तरह उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति में अलग रास्ता चुन लिया।

6. टॉम वडक्कन: बालाकोट एयर स्ट्राइक पर पार्टी के रुख से असहमति
टॉम वडक्कन करीब 20 साल तक सोनिया गांधी के करीबी सहयोगियों में गिने जाते रहे थे। उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला उस समय किया, जब बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद कांग्रेस के रुख को लेकर राजनीतिक बहस चल रही थी। वडक्कन ने एयर स्ट्राइक के मुद्दे पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया से असहमति जताई थी। बाद में वह भाजपा में शामिल हो गए। उनका कांग्रेस छोड़ना इसलिए चर्चा में रहा, क्योंकि वह लंबे समय तक पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के साथ काम कर चुके थे।

5. रंजीत देशमुख: महाराष्ट्र कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने संगठन पर उठाए सवाल
महाराष्ट्र कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रंजीत देशमुख ने संगठन से जुड़े मुद्दों को लेकर पार्टी छोड़ दी थी। वह महाराष्ट्र की विलासराव देशमुख सरकार में मंत्री भी रह चुके थे। रंजीत देशमुख ने पार्टी के कामकाज और संगठन की स्थिति पर सवाल उठाए थे। बाद में खराब स्वास्थ्य के कारण वह सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। महाराष्ट्र कांग्रेस में लंबे समय तक सक्रिय रहे देशमुख का पार्टी से अलग होना राज्य में संगठनात्मक असंतोष के उदाहरणों में गिना गया।

4. चौधरी बीरेंद्र सिंह: हरियाणा कांग्रेस छोड़ भाजपा में गए
हरियाणा के वरिष्ठ नेता चौधरी बीरेंद्र सिंह ने 2014 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। वह राज्य की राजनीति में प्रभावशाली नेता माने जाते थे। उनके कांग्रेस छोड़ने की वजह तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ मतभेदों को बताया गया था। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने 2014 का लोकसभा चुनाव जीता और बाद में केंद्र सरकार में मंत्री बने। उनका पार्टी बदलना हरियाणा में कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक झटका माना गया।

3. रीता बहुगुणा जोशी: उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने छोड़ी पार्टी
रीता बहुगुणा जोशी उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष रह चुकी थीं। उन्होंने 2016 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने का फैसला किया था। उनके पिता हेमवती नंदन बहुगुणा कांग्रेस के दिग्गज नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। इस तरह रीता बहुगुणा जोशी का परिवार लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीति से जुड़ा रहा। कांग्रेस छोड़ने के बाद वह भाजपा में सक्रिय हुईं और उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई भूमिका निभाई। उनके पार्टी छोड़ने को राज्य में कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण नुकसान के तौर पर देखा गया।

2. राधाकृष्ण विखे पाटिल: बेटे को टिकट नहीं मिलने से नाराजगी
महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल पांच बार विधायक रह चुके हैं और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका भी निभा चुके हैं। उनके पिता बालासाहब विखे पाटिल कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। राधाकृष्ण विखे पाटिल की नाराजगी की एक वजह उनके बेटे सुजय विखे पाटिल को अहमदनगर लोकसभा सीट से कांग्रेस का टिकट नहीं मिलना बताई गई थी। सुजय विखे पाटिल बाद में भाजपा में शामिल हो गए और अहमदनगर से सांसद चुने गए। राधाकृष्ण विखे पाटिल के कांग्रेस छोड़ने को महाराष्ट्र में पार्टी के लिए एक और झटका माना गया। उनका मामला टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व के साथ मतभेदों के संदर्भ में चर्चा में रहा।

1. जयवीर शेरगिल: कांग्रेस की निर्णय प्रक्रिया पर उठाए सवाल
कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे जयवीर शेरगिल ने पार्टी के प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया था और कांग्रेस से नाता तोड़ लिया था। उन्होंने तत्कालीन अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर अपने फैसले की वजह बताई थी। अपने पत्र में जयवीर शेरगिल ने आरोप लगाया था कि पार्टी में फैसले अब जनता और देश के हितों के बजाय कुछ लोगों के स्वार्थ से प्रभावित होते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी के कुछ नेता चाटुकारिता में लगे हुए हैं और जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर रहे हैं। जयवीर शेरगिल सर्वोच्च न्यायालय में वकालत करते रहे हैं। वह उस समय भी चर्चा में आए थे, जब उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को कानूनी सहायता देने के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहने वाली टोल-फ्री कानूनी हेल्पलाइन शुरू की थी। उनका कांग्रेस से अलग होना पार्टी की निर्णय प्रक्रिया, संगठन और नेतृत्व के कामकाज पर सवाल उठाने वाले नेताओं की सूची में एक और नाम था।

कांग्रेस के लिए क्या संकेत देता है नेताओं का पार्टी छोड़ना?
कांग्रेस छोड़ने वाले इन नेताओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग रही है। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक, प्रवक्ता और युवा नेता शामिल हैं। कुछ ने पार्टी नेतृत्व से मतभेदों के कारण इस्तीफा दिया, कुछ ने टिकट या पद को लेकर असंतोष जताया, जबकि कुछ ने संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाए। कांग्रेस छोड़ने वाले कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा कि पार्टी में फैसले लेने की प्रक्रिया, आंतरिक लोकतंत्र और जमीनी स्तर पर काम करने वाले नेताओं की भूमिका को लेकर समस्याएं हैं। हालांकि, हर नेता के पार्टी छोड़ने की वजह अलग रही है और सभी मामलों को एक ही कारण से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। कांग्रेस के सामने चुनौती केवल पुराने नेताओं को अपने साथ बनाए रखने की नहीं, बल्कि संगठन को मजबूत करने, राज्यों में नेतृत्व को स्पष्ट दिशा देने और कार्यकर्ताओं का भरोसा बनाए रखने की भी है। आने वाले चुनावों में पार्टी इन चुनौतियों का सामना किस तरह करती है, इसका असर उसके राजनीतिक भविष्य पर पड़ सकता है।

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