आपातकाल: भारत के लोकतंत्र की सबसे काली रात – 50 साल बाद याद करते हैं वो दिन

आज से ठीक 50 साल पहले, 25 जून 1975 की रात को देश में ऐसा फैसला लिया गया, जिसने भारत के लोकतंत्र की बुनियाद को झकझोर दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत "आंतरिक अशांति" का हवाला देकर आपातकाल लगाने की सिफारिश की, और आधी रात को देश की आजादी पर ताला जड़ दिया गया।


क्या थी पृष्ठभूमि?
1970 के दशक में बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। छात्र आंदोलनों से लेकर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया था।

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाया और छह साल तक चुनाव लड़ने से अयोग्य करार दे दिया। इस फैसले के बाद इस्तीफे की मांग जोर पकड़ने लगी।

25 जून की रात क्या हुआ?
-रातों-रात राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा पर दस्तखत कर दिए। बिजली काट दी गई, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, और बड़े पैमाने पर विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं।

-जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई जैसे नेता मीसा (MISA) के तहत जेल भेज दिए गए।

क्या-क्या हुआ उस दौरान?
-मौलिक अधिकार छीन लिए गए।
-लोग अब कोर्ट में अपनी जमानत के लिए याचिका तक नहीं दे सकते थे।

प्रेस की आज़ादी खत्म कर दी गई।
-हर खबर, हर तस्वीर छपने से पहले सरकारी मंजूरी जरूरी हो गई।

नसबंदी का आतंक फैला।
-दो सालों में 1 करोड़ से ज्यादा लोगों की नसबंदी की गई। कई जगह राशन और नौकरी तक रोक दी गई अगर कोई नसबंदी से इनकार करता था।

संविधान में बदलाव किए गए।

-42वें संशोधन ने केंद्र को और ताकतवर बना दिया, और लोकसभा का कार्यकाल भी 6 साल कर दिया गया।

'समाचार' नाम की एकमात्र एजेंसी
-1 फरवरी 1976 को चारों प्रमुख समाचार एजेंसियों – पीटीआई, यूएनआई, समाचार भारती और हिंदुस्तान समाचार – को मिलाकर 'समाचार' नाम से एक नई एजेंसी बना दी गई। भारतीय प्रेस परिषद को भी भंग कर दिया गया।

आपातकाल का अंत और सत्ता का उलटफेर
-मार्च 1977 में जब चुनाव हुए तो जनता पार्टी ने कांग्रेस को करारी शिकस्त दी। 21 मार्च को आपातकाल हटा लिया गया और 24 मार्च को मोरारजी देसाई के नेतृत्व में नई सरकार बनी।

नई सरकार ने मई 1977 में शाह आयोग गठित किया ताकि पूरे आपातकाल की जांच हो सके। इस आयोग ने खुलासा किया कि:
-1 करोड़ से ज्यादा नसबंदी की गईं।
-1,774 लोगों की नसबंदी के बाद मौत हुई।
-प्रेस को डराने के लिए बिजली काटी गई।
-25,000 से ज्यादा कर्मचारियों को जबरन रिटायर किया गया।

बड़ा बदलाव – 44वां संशोधन
-जनता सरकार ने 1978 में 44वां संशोधन पास किया, जिसमें "आंतरिक अशांति" की जगह "सशस्त्र विद्रोह" शब्द जोड़ा गया ताकि भविष्य में आपातकाल लगाना आसान न हो।

आपातकाल का दौर भारत के लोकतंत्र की सबसे काली रात कहा जाता है। इसने सिखाया कि आजादी की कीमत हमेशा सतर्कता होती है। 50 साल बाद आज भी यह दौर हमें याद दिलाता है कि संविधान, अभिव्यक्ति की आजादी और न्यायपालिका कितनी अनमोल हैं।

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